अभियान के उद्देश्य का विवरण

प्रतिज्ञा: लैंगिक समानता और सुरक्षित गर्भपात अभियान

प्रतिज्ञा: लैंगिक समानता और सुरक्षित गर्भपात अभियानः एक ऐसा आधार तैयार करना चाहता है जो भारत में लिंगभेद की वजह से होने वाले लिंग चयन की गंभीर समस्या का हल करे और साथ ही, कानूनी तौर मान्य महिलाओं के सुलभ सुरक्षित गर्भपात के अधिकार की रक्षा करे।

लिंगभेद की वजह से होने वाले लिंग चयन की समस्या

भारत एक पुरुष प्रधान समाज है। इसमें महिलाओं और लड़कियों को समान पोषण, शिक्षा, सुरक्षा और आर्थिक अवसर के अधिकारों को सीमित कर दिया जाता हैं। महिलाएं स्वस्थ-सुखी रहने और बच्चा पैदा करने के मामले में भी अपना निर्णय नहीं ले सकती हैं। वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संस्थान महिलाओं को उनके अधिकार प्रयोग करने योग्य परिवेश देने में असफल रहे हैं।

लिंग भेद और हिंसा (जो पति भी करते हैं) की वजह से महिलाओं के यौन संबंध और प्रजनन संबंधी अधिकार कम हो गए हैं। महिलाओं को जबरन कम उम्र में शादी और बच्चा पैदा करने को मजबूर किया जाता है। बेटे के लिए बार-बार गर्भवती होने को लाचार किया जाता है क्योंकि भारतीय मान्यता में बेटे से ही वंश बढ़ता है। अक्सर दूसरी और उसके बाद पैदा बेटियां तिरस्कृत जिन्दगी जीती हैं और इस वजह से शिशु मृत्यु के मामले भी बढ़ते हैं। भारतीय परिवार बेटा पाने और साथ ही, परिवार छोटा रखने के लिए लिंग परीक्षण करवाते हैं। प्रतिकूल लिंग अनुपात के साथ महिलाओं के लिए प्रतिकूल परिवेश और लड़कियों (लड़कों की तुलना) में उच्च शिशु मृत्यु दर और रुग्णता आदि बेटे की चाहत के कुछ दुष्परिणाम हैं।

hindiजन्म के समय और आरंभिक बचपन में लड़के और लड़कियों का अनुपात जनसंख्या वितरण का एक महत्वपूर्ण संकेतक है जिसका सामाजिक कल्याण के भविष्य पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आज जबकि अधिकांश विकसित देशों में लिंग अनुपात लड़कियों के पक्ष में है भारत और कुछ दक्षिण/दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों में यह अनुपात उलट गया है। भारतीय जनगणना (2011) के आंकड़ों के अनुसार बच्चों (0-6 साल) का लिंग अनुपात (प्रति 1000 लड़कों की तुलना में केवल 914 लड़कियां) चिंताजनक है। सन् 1901 के पहले गणना के बाद से यह अनुपात लगातार गिरता जा रहा है। सन् 2001  में यह संख्या 927 तो 1991 में 945 थी। यह जन्म से पूर्व लिंग चयन और जन्म के बाद भेदभाव का जीता-जागता उदाहरण है।

लिंग चयन

भारतीय परिवार और समाज दोनों में बेटे को जन्म देने पर जोर दिया जाता है। लिंगभेद के आधार पर लिंग चयन यानी बेटे को जन्म देना इसका प्रमाण है कि आज भी महिलाओं और लड़़कियों को कदम-कदम पर सामाजिक, सांस्कृतिक, राजीनीतिक और आर्थिक असमानताएं झेलनी पड़ती हैं। इस तरह बेटे का जन्म लिंग भेद का जीता-जागता नमूना है। पिछले कुछ दशकों में जांच की तकनीकियों की सुविधाओं का दुरूपयोग करके कुछ अनैतिक चिकित्सक लिंग निर्धारण के लिए जांच सेवा देते रहे हैं जो अब अवैध है।

जन्म से पूर्व लिंग परीक्षण और कन्या भू्रण होने पर उसका सफाया – यह मामला पहली बार 1970 के दशक में सामने आया। इस कुकर्म को रोकने का पहला संगठित प्रयास सार्वजनिक संगठनों ने 1982 से शुरू किया। मुंबई का ‘फोरम अगेंस्ट सेक्स डिटर्मिनेशन एण्ड सेक्स प्री-सलेक्शन’ का गठन 1985 में किया गया। ‘‘महाराष्ट्र जन्मपूर्व जांच तकनीकी प्रयोग अधिनियम, 1988’’ बनने के पीछे यह एक मुख्य वजह थी।

इसके बाद भारत सरकार ने ‘‘जन्मपूर्व जांच तकनीकी दुरुपयोग (विनियमन एवं रोकथाम) अधिनियम, 1994’’ लागू किया। इस अधिनियम के मुख्य उद्देश्य थेः आनुवांशिक बीमारियों या कुछ जन्मजात विकृतियों या लिंग संबंधी बीमारियों की रोकथाम में जन्मपूर्व जांच तकनीकी के प्रयोग के लिए विनियम बनाना और लिंग परीक्षण के लिए इन तकनीकियों के दुरुपयोग की रोकथाम। इस अधिनियम का संशोधित रूप हैः ‘गर्भधारण-पूर्व और जन्मपूर्व जांच तकनीकियां (लिंग निर्धारण प्रतिबंध) कानून, 2003 जिसका उद्देश्य गर्भधारण-पूर्व लिंग निर्धारण को भी अपने दायरे में लेना है।

पीसीपीएनडीटी अधिनियम, 2003 में गर्भधारण-पूर्व या जन्मपूर्व जांच तकनीकियांे से लिंग निर्धारण और भ्रूण  के लिंग की घोषणा पर प्रतिबंध है। गर्भधारण-पूर्व या जन्मपूर्व जांच तकनीकियांे से लिंग निर्धारण के विज्ञापन पर भी प्रतिबंध है और उल्लंघन करने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। मौजूदा कानून से एक साथ दो लक्ष्यों को पूरा करना है। पहला, जन्मपूर्व जांच प्रक्रियाओं/परीक्षणों के नियम और दूसरा, ‘लिंग चयन’ पर पूरा प्रतिबंध यानि ‘लिंग निर्धारण’ के उद्देश्य से किसी प्रकार की जन्मपूर्व जांच पर रोक।

सुरक्षित गर्भपात सेवाओं तक पहुंच

चिकित्सकीय गर्भपात अधिनियम, 1971 (एमटीपी एक्ट) भारतीय महिलाआंे को सुरक्षित गर्भपात सेवाओं का अधिकार देता है। एमटीपी अधिनियम में उल्लेख है कि गर्भपात के क्या मान्य मानक हैं, यह कौन करा सकता है, कहां कराया जा सकता है और किस गर्भावधी तक किया जा सकता है। चिकित्सकीय गर्भपात में सुयोग्य स्वास्थ्य कर्मी द्वारा सर्जरी या चिकित्सकीय गर्भपात की दवा (मिफेप्रिस्टोन और मिजोप्रोस्टाॅल) से किया गया गर्भपात शामिल है। हालांकि इस कानून के बारे में समुदाय की महिलाओं और सामुदायिक कार्यकर्ताओं और कभी-कभी चिकित्साकर्मियों में जानकारी का नितांत अभाव देखा जाता है।

इस तथ्य के पर्याप्त रिकाॅर्ड हैं कि आज भी भारत की लाखों जरूरतमंद महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात सेवाएं उपलब्ध नहीं है। देश की अधिकांश महिलाओं को नहीं पता है कि गर्भपात कानूनी है और यह सेवा उपलब्ध  है। इतना ही नहीं, एक कड़वा सच यह भी है कि हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में गर्भपात को बहुत बड़ा कलंक माना जाता है इसलिए बहुत-सी महिलाएं असुरक्षित गर्भपात कराने को मजबूर हो जाती हैं और ऐसे में न तो प्रशिक्षित और सुयोग्य स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध होते हैं और न ही स्वास्थ्य सेवा लेने का उचित परिवेश मिलता है। महिलाओं द्वारा लाचारी में खुद दवा दुकानदार से गर्भपात की दवाएं लेकर गर्भपात करने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और इसका कारण है उचित शुल्क पर सुलभ सुरक्षित गर्भपात और सरकारी या निजी अस्पतालों में संवेदनशील गर्भपात सेवाओं का अभाव।

ठोस आंकड़ों के अभाव में यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में हर साल 64 लाख गर्भपात होते हैं। इनमें आधे (लगभग 36 लाख) असुरक्षित होते हैं और असुरक्षित    परिवेश व अयोग्य सेवादाता के हाथ होते हैं। देश में आज भी मातृ मृत्यु के 5 सबसे बड़े कारणों में एक असुरक्षित और संक्रामक गर्भपात है। इससे लगातार बीमार रहने के असंख्य मामले सामने आते हैं। असुरक्षित गर्भपात से सबसे अधिक प्रभावित और शिकार महिला समूह आम तौर पर सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ी महिलाएं, युवतियां और गांव-देहात की महिलाएं हैं।

ऐसे समाज में जहां महिलाओं को अपने शरीर की सुरक्षा के लिए भी सीमित अधिकार हैं और वे न तो यौन संबंध से मना कर सकती हैं और न ही गर्भनिरोध के ठोस उपाय कर सकती हैं सुलभ सुरक्षित गर्भपात का अधिकार आवश्यक है। इससे बच्चा पैदा करने पर उनका नियंत्रण रहेगा। इसलिए सुलभ सुरक्षित गर्भपात उनके लिए स्वास्थ्य का साधन है और उनका अधिकार है जो उन्हें मिलना चाहिए।

दोनों मामलों के आपस में मिलने से सुलभ गर्भपात के रास्ते में रुकावटें आती हैं

चिकित्सकीय गर्भपात अधिनियम, 1971 और पीसीपीएनडीटी अधिनियम, कानून के दृष्टिकोण से बिल्कुल अलग-अलग हैं। हालांकि दोनों कानूनों को लागू करने वाले अक्सर दोनों को आपस में मिला देते हैं। परिणामतः सुरक्षित गर्भपात तक पहुंच में रुकावटें आती हैं। लिंग परीक्षण के बाद कन्या भ्रूण पाए जाने पर अक्सर गर्भपात कराया जाता है। परिणामतः यह गलत धारणा बनती है कि गर्भपात की सुविधा पर रोक आवश्यक है। अनुमान बताते हैं कि देश के केवल 2-11 प्रतिशत गर्भपात लिंग चयन  के उद्देश्य से होते हैं। बाकी गर्भपात विभिन्न कारणों से अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाने के लिए होते हैं।

मुख्य चिंता का विषय यह है कि कानून लिंग चयन और सुरक्षित गर्भपात को अलग-अलग मुद्दा मानता है। इस संबंध में कानून और लिंग परीक्षण की समस्या के संबंध में लोगों की समझ के मद्देनजर इनको लागू करने में बहुत सममिश्रण हो जाता है। इसका दुष्परिणाम महिलाओं के सुरक्षित, कानूनी तौर पर मान्य गर्भपात सेवाओं के अधिकार पर पड़ता है।

प्रतिज्ञा अभियान का मुख्य उद्देश्य क्या है?

अभियान के लिए सहमति करार करने वालों का मानना है:

  • गर्भपात और लिंग चयन को प्रभावित करने वाले कारणों – लैंगिक असमानता और लिंगभेद की समस्याओं को गंभीरता से लेना चाहिए।
  • लिंग चयन को लिंभ भेद का सबसे बुरा स्वरूप मान कर उसका हल करना – संरचनात्मक कारणों को दूर करना। फिलहाल तकनीकी के दुरुपयोग से लिंग निर्धारण रोकथाम मुख्य मुद्दा होना चाहिए, न कि गर्भपात की रोकथाम का।
  • लिंग भेद आधारित लिंग चयन और सुलभ सुरक्षित गर्भपात के अधिकार दोनों मुद्दों के बीच अंतर स्पष्ट करना और प्रत्येक का अलग से समाधान करना
  • हमें एक ऐसा आधार चाहिए जिस पर एक साथ महिलाओं के सुलभ सुरक्षित गर्भपात के अधिकार और लिंग भेद आधारित लिंग चयन की रोकथाम के मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जा सके।

आज आवश्यकता है कि महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात की सुविधा मिले। लिंग भेद के आधार पर लिंग परीक्षण को बढ़ावा देने वाले सभी चिकित्सा और सामाजिक प्रयासों से उन्हें सुरक्षित रखा जाए। प्रतिज्ञा के उद्देश्य के विवरण से ये समस्याएं और उन्हें दूर करने की हमारी प्रतिबद्धता सामने आती हैं। हमें विश्वास है कि आप में से अधिकांश लोग हमारे विचार से सहमत होंगे। इस समस्या से सजग और प्रतिज्ञा अभियान से जुड़ने के इच्छुक आप सभी का हम स्वागत् करते हैं। आइए, महिलाओं के अधिकार के लिए एक कदम आगे बढ़ाएं, उनकी जिन्दगी बदलने में मदद करें।

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 1. 2001 की जनगणना में 0-6 आयु का आंकड़ा प्रकाशित होने के बाद शोधकर्ताओं ने लिंग चयन के उद्देश्य से गर्भपात और अत्यधिक शिशु मृत्यु दर में वृद्धि के परिणामस्वरूप बच्चों के लिंग अनुपात में गिरावट आई है। (झा एट अल., 2006; 2011; नवनीथन एवं धर्मलिंगम, 2011; कुलकर्णी, 2012)
2. सीमित चिकित्सकीय समस्याएं अपवाद हैं
3.  बनर्जी एट अल 2012। सुलभ सुरक्षित गर्भपात सेवाओं और व्यवहारजन्य परिवर्तन संवाद पर महिला केंद्रित शोध;
4. बिहार एवं झारखंड, भारत की सभी वर्गों की महिलाओं का अध्ययन। बीएमसी पब्लिक हेल्थ 2012, 12ः175
दुग्गल आर, रामचंद्रण वी. द एबाॅर्शन एसेसमेंट प्रोजेक्ट – इंडिया; मुख्य निष्कर्ष एवं अनुशंसाएं।
5. प्रजनन स्वास्थ्य सामग्रियां, खंड 12 अंक 24, 2004। 122-129

1980 से 2010 तक 4-12 मिलियन कन्या भ्रूण की हत्या का अनुमान।